नई दिल्ली|22 मई 2026: देश की न्यायिक और संवैधानिक बहस के बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत का एक बयान शुक्रवार को चर्चा का केंद्र बन गया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संविधान किसी सीमित वर्ग, संपन्न लोगों या केवल महंगी कानूनी प्रक्रिया तक पहुंच रखने वालों का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक का समान अधिकार है।
मुख्य न्यायाधीश ने यह टिप्पणी वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह की आत्मकथा ‘The Constitution Is My Home: Conversations on a Life in Law’ के विमोचन कार्यक्रम के लिए भेजे गए वीडियो संदेश में की। कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाने के बावजूद उन्होंने अपने संदेश के माध्यम से संविधान और न्याय तक समान पहुंच की अवधारणा पर जोर दिया।
CJI संविधान बयान: “संविधान सबका साझा घर है”
अपने संबोधन में जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि संविधान केवल न्यायाधीशों, वकीलों या सरकारी संस्थाओं तक सीमित नहीं है। उन्होंने इसे “साझा घर” बताते हुए कहा कि शहर में रहने वाला व्यक्ति, गांव का नागरिक, गरीब, वंचित और समाज के किनारे खड़ा व्यक्ति— सभी संविधान में समान भरोसा और अधिकार रखते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि संविधान को केवल अदालतों में मौजूद एक कानूनी दस्तावेज के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उसका वास्तविक प्रभाव लोगों के जीवन, लोकतांत्रिक मूल्यों और न्याय व्यवस्था में दिखाई देता है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने CJI को लिखा खुला पत्र
इसी बीच एक अन्य संवैधानिक बहस भी सामने आई। 72 वकीलों, कानून के छात्रों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और कानूनी कार्यकर्ताओं के समूह ने मुख्य न्यायाधीश को खुला पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया।
यह मामला उन टिप्पणियों से जुड़ा है जो विकास परियोजनाओं को चुनौती देने वाली पर्यावरणीय याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आई थीं। पत्र लिखने वालों का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए वैधानिक और संवैधानिक दायरे में काम करने वाले नागरिकों और समूहों को “कथित पर्यावरण कार्यकर्ता” कहना उचित नहीं माना जाना चाहिए।
पत्र में यह भी आग्रह किया गया कि पर्यावरणीय जनहित याचिकाओं और अपीलों को संवैधानिक अधिकारों और पर्यावरणीय दायित्वों के संरक्षण के वैध माध्यम के रूप में फिर से स्वीकार करने की सार्वजनिक पुष्टि की जाए।
सुप्रीम कोर्ट में कई महत्वपूर्ण कानूनी मामलों पर भी नजर
इसी दिन न्यायपालिका से जुड़े कई अहम मामलों में भी प्रगति देखने को मिली। इनमें प्रवर्तन निदेशालय की याचिका से जुड़े मामले में आगे की सुनवाई की तारीख तय होना, विश्वविद्यालय प्रशासनिक अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और राजद्रोह कानून से जुड़े मामलों पर अदालत की टिप्पणी शामिल रही।
साथ ही शीर्ष अदालत ने एक अन्य मामले में कहा कि वसीयत का उद्देश्य कई बार उत्तराधिकार के सामान्य क्रम को बदलना भी हो सकता है और केवल प्राकृतिक वारिसों को संपत्ति से बाहर रखना अपने आप में वसीयत को अवैध नहीं बनाता।
इन घटनाक्रमों के बीच मुख्य न्यायाधीश का यह संदेश विशेष महत्व रखता है कि संविधान की शक्ति तभी सार्थक है, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।










