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Governor Movie Review: जब भारत दिवालिया होने की कगार पर था, तब एक गवर्नर ने बदली देश की आर्थिक किस्मत

On: June 14, 2026
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Governor Movie Review, जब भारत दिवालिया होने की कगार पर था, तब एक गवर्नर ने बदली देश की आर्थिक किस्मत
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14 जून 2026/मुंबई: भारत आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब देश के विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुके थे और हालात इतने गंभीर हो गए थे कि सोना विदेश भेजने की नौबत आ गई थी। इसी ऐतिहासिक आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म ‘गवर्नर’ अब सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है।

यह फिल्म सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि उस दौर का दस्तावेज है जब देश आर्थिक अनिश्चितता, राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ते वित्तीय दबाव के बीच संघर्ष कर रहा था। फिल्म दर्शकों को 1990-91 के उस समय में ले जाती है, जब भारत को अपने आर्थिक अस्तित्व को बचाने के लिए असाधारण फैसले लेने पड़े थे।

Governor Movie Review: आर्थिक संकट की सच्ची पृष्ठभूमि

फिल्म की शुरुआत साल 2022 में श्रीलंका में आए आर्थिक संकट की झलकियों से होती है। ईंधन की किल्लत, महंगाई और जनता के विरोध प्रदर्शनों के दृश्य यह याद दिलाते हैं कि आर्थिक अस्थिरता किसी भी देश को किस हद तक प्रभावित कर सकती है।

इसके बाद कहानी भारत के वर्ष 1990 के आर्थिक संकट की ओर बढ़ती है। उस समय देश पर विदेशी कर्ज का दबाव बढ़ रहा था, तेल की कीमतों में उछाल आया हुआ था और विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहा था। हालात इतने खराब थे कि जरूरी आयात तक प्रभावित होने लगे थे।

इसी चुनौतीपूर्ण समय में ए. रमनन (मनोज बाजपेयी) को राष्ट्रीय बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। उनका किरदार पूर्व आरबीआई गवर्नर एस. वेंकिटरमणन से प्रेरित बताया गया है।

जब देश को बचाने के लिए विदेश भेजना पड़ा सोना

फिल्म का सबसे प्रभावशाली हिस्सा वह है, जब आर्थिक संकट चरम पर पहुंच जाता है। राजनीतिक दबाव, नौकरशाही की चुनौतियां और बढ़ती जनचिंता के बीच रमनन लगातार समाधान खोजने में जुटे रहते हैं।

कहानी दिखाती है कि किस तरह तत्कालीन सरकार और केंद्रीय बैंक ने मिलकर देश का सोना विदेश भेजने का कठिन फैसला लिया। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा जुटाना था ताकि भारत अपनी तत्काल वित्तीय जिम्मेदारियां पूरी कर सके।

यह घटनाक्रम भारतीय आर्थिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील अध्यायों में से एक माना जाता है। फिल्म इस फैसले के पीछे मौजूद दबाव और परिस्थितियों को प्रभावशाली तरीके से सामने रखने की कोशिश करती है।

सामाजिक और आर्थिक संघर्ष को यथार्थवादी ढंग से दिखाती है फिल्म

निर्देशक चिन्मय दी मंडलेकर ने फिल्म को किसी राजनीतिक प्रचार या नायक पूजा तक सीमित नहीं रखा है। कहानी अपेक्षाकृत संतुलित नजर आती है और उस दौर की कठिनाइयों को वास्तविकता के करीब से दिखाने का प्रयास करती है।

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यह आर्थिक संकट को सिर्फ आंकड़ों में नहीं बताती, बल्कि उसके सामाजिक प्रभावों को भी सामने लाती है। महंगाई, बेरोजगारी और जनता की चिंता को कहानी में स्वाभाविक रूप से पिरोया गया है।

हालांकि, कुछ जगहों पर दर्शकों को यह महसूस हो सकता है कि सरकार, केंद्रीय बैंक और शीर्ष अधिकारियों के बीच हुए मतभेदों और फैसलों के पीछे की जटिल बहसों को और विस्तार से दिखाया जा सकता था। इससे फिल्म और अधिक प्रभावशाली बन सकती थी।

मनोज बाजपेयी और अदा शर्मा का दमदार अभिनय

मनोज बाजपेयी ने अपने अनुभव के अनुरूप एक गंभीर और जिम्मेदार अधिकारी की भूमिका को प्रभावशाली ढंग से निभाया है। उनके अभिनय में संयम और आत्मविश्वास साफ दिखाई देता है। कई दृश्यों में वह किरदार की मानसिक दुविधा और जिम्मेदारियों का बोझ बखूबी दर्शाते हैं।

वहीं, अदा शर्मा एक तेज-तर्रार पत्रकार की भूमिका में नजर आती हैं और कहानी में लगातार सक्रिय बनी रहती हैं। उनकी मौजूदगी फिल्म में घटनाओं को एक अलग दृष्टिकोण से देखने का अवसर देती है।

नौशाद मोहम्मद कुंजू ने उप-गवर्नर के किरदार में संतुलित अभिनय किया है, जबकि मधु सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद अपनी छाप छोड़ने में सफल रहती हैं।

क्या देखें यह फिल्म?

अगर आपको भारतीय आर्थिक इतिहास, वास्तविक घटनाओं पर आधारित कहानियां और गंभीर विषयों वाली फिल्में पसंद हैं, तो ‘गवर्नर’ एक दिलचस्प विकल्प साबित हो सकती है। यह फिल्म मनोरंजन के साथ-साथ उस दौर की याद भी दिलाती है, जब भारत ने आर्थिक संकट से निकलकर आगे बढ़ने की दिशा तय की थी।

फिल्म भले ही हर सवाल का जवाब नहीं देती, लेकिन यह जरूर बताती है कि कठिन समय में लिए गए कुछ साहसिक फैसले किसी देश की दिशा और भविष्य बदल सकते हैं।

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