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CAPF अधिकारियों को अलग नहीं माना जा सकता, देश की सीमाओं पर दे रहे सर्वोच्च बलिदान: सुप्रीम कोर्ट

On: September 2, 2026
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CAPF अधिकारियों को अलग नहीं माना जा सकता, सुप्रीम कोर्ट
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नई दिल्ली। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के कैडर अधिकारियों से जुड़े ‘ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस’ (OGAS) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार के रुख पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने साफ कहा कि यह धारणा सही नहीं है कि CAPF में नेतृत्व करने के लिए सक्षम अधिकारियों की कमी है। ये अधिकारी देश की सीमाओं की सुरक्षा से लेकर आंतरिक सुरक्षा तक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे हैं और लंबे अनुभव के बावजूद उन्हें अलग नजरिए से नहीं देखा जा सकता।

अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान केंद्रीय गृह सचिव से जवाब तलब किया है। उन्हें दो सप्ताह के भीतर यह बताना होगा कि 23 मई 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। साथ ही सेवा नियमों में किए गए बदलाव और आगे की कार्ययोजना का पूरा रोडमैप भी अदालत के सामने रखना होगा।

CAPF अधिकारी देश की सीमाओं पर दे रहे सर्वोच्च बलिदान

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान CAPF अधिकारियों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले इन अधिकारियों को नेतृत्व के लिए अक्षम मानना उचित नहीं है। उनके पास करीब तीन दशक का अनुभव है और वे देश की सुरक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दे रहे हैं।

अदालत का यह रुख ऐसे समय सामने आया है जब CAPF के कैडर अधिकारियों और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) से अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। मामला केवल पदोन्नति या पदों के बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि बलों के कैडर ढांचे, नेतृत्व और संस्थागत स्वायत्तता से भी जुड़ा हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से यह भी पूछा है कि SAG स्तर तक IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति कम करने के उसके निर्देश पर अभी तक कितनी कार्रवाई हुई है और कितने पद कम किए गए हैं।

23 मई 2025 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दिए थे अहम निर्देश

यह विवाद सुप्रीम कोर्ट के 23 मई 2025 के उस महत्वपूर्ण फैसले से जुड़ा है, जो संजय प्रकाश एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामले में आया था। न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने CAPF के ग्रुप ‘A’ कार्यपालक संवर्ग को ‘ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस’ (OGAS) घोषित करते हुए कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे।

फैसले में CAPF में नियमित कैडर समीक्षा, नए सेवा नियम बनाने और नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (NFFU) लागू करने जैसे उपायों पर जोर दिया गया था। इसका उद्देश्य लंबे समय से चली आ रही पदोन्नति संबंधी अड़चनों को दूर करना था।

इसके अलावा, CRPF, BSF, CISF, ITBP और SSB जैसे केंद्रीय बलों में SAG ग्रेड तक IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को दो साल के भीतर चरणबद्ध तरीके से कम करने का निर्देश दिया गया था।

हालांकि, कैडर अधिकारियों का दावा है कि अदालत के निर्देश के बावजूद IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति में अपेक्षित कमी नहीं आई।

सरकार के खिलाफ इसलिए दाखिल हुई अवमानना याचिका

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार को निर्धारित समय सीमा के भीतर निर्देशों का पालन करना था। लेकिन कैडर अधिकारियों के मुताबिक, अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने के कारण दिसंबर 2025 में सेवानिवृत्त कैडर अधिकारियों ने केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन के खिलाफ अवमानना याचिका दाखिल की।

बुधवार की सुनवाई में अदालत ने इसी मामले को गंभीरता से लेते हुए सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। गृह सचिव को यह बताना होगा कि फैसले के बाद सेवा नियमों में क्या परिवर्तन किए गए, कितने प्रतिनियुक्ति पद कम किए गए और आगे की कार्रवाई की समयसीमा क्या है।

अदालत ने संकेत दिया है कि वह अब फैसले के अनुपालन की निगरानी स्वयं करेगी। इसका अर्थ यह है कि आने वाले समय में सरकार को इस मामले में उठाए गए कदमों का हिसाब अदालत के समक्ष देना पड़ सकता है।

मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है।

छह महीने में 56 से ज्यादा IPS अधिकारी CAPF में आए

इस मामले का एक अहम पहलू IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 23 मई 2025 के फैसले में CAPF में IPS प्रतिनियुक्ति को धीरे-धीरे कम करने की बात कही थी।

वहीं, कैडर अधिकारियों की ओर से दावा किया गया है कि फैसले के बाद के करीब छह महीनों में केंद्रीय बलों में IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति में कमी के बजाय तेजी दिखाई दी। उनके मुताबिक, 56 से अधिक IPS अधिकारी CAPF में प्रतिनियुक्ति पर ज्वाइन कर चुके हैं।

इससे कैडर अधिकारियों के बीच यह सवाल भी उठा है कि यदि सर्वोच्च अदालत ने प्रतिनियुक्ति को चरणबद्ध तरीके से कम करने का निर्देश दिया है, तो जमीनी स्तर पर इसका उलटा असर क्यों दिखाई दे रहा है।

बताया गया है कि केंद्र सरकार ने फैसले के अनुपालन के लिए निर्धारित अवधि के दौरान रिव्यू पिटीशन भी दाखिल की थी। 28 अक्टूबर 2025 को न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने रिव्यू पिटीशन खारिज कर दी थी।

नए CAPF कानून को लेकर भी उठे सवाल

इस विवाद के बीच केंद्र सरकार संसद में ‘CAPF (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026’ लेकर आई, जिसे संसद से पारित कराया गया। कैडर अधिकारियों ने इस कानून को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती भी दी है।

पूर्व कैडर अधिकारियों का आरोप है कि नए कानून के जरिए केंद्रीय बलों में IG और उससे ऊपर के पदों पर IPS प्रतिनियुक्ति के लिए न्यूनतम प्रतिशत को वैधानिक संरक्षण दिया गया है। उनका यह भी कहना है कि सेवा संबंधी मामलों में गृह मंत्रालय को व्यापक अधिकार दिए जाने से CAPF की संस्थागत स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।

यही वजह है कि मौजूदा कानूनी लड़ाई अब केवल पदों और प्रतिनियुक्तियों तक सीमित नहीं रह गई है। इसके केंद्र में यह बड़ा सवाल भी है कि केंद्रीय बलों का नेतृत्व किस व्यवस्था के तहत हो और लंबे समय से बलों में सेवा दे रहे कैडर अधिकारियों के अनुभव एवं करियर प्रगति को किस तरह सुरक्षित किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट की बुधवार की टिप्पणी ने इस बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। अब निगाहें 22 सितंबर की सुनवाई पर रहेंगी, जब केंद्र सरकार को अदालत के सामने 23 मई 2025 के फैसले के अनुपालन की स्थिति और आगे की कार्ययोजना स्पष्ट करनी होगी।

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