गोरखपुर, बुधवार, 23 सितंबर 2026। गोरखनाथ मंदिर का वातावरण बुधवार को भक्ति और वैदिक मंत्रोच्चार से गूंज उठा। गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिग्विजयनाथ स्मृति भवन सभागार में श्रीमद्भागवत महापुराण कथा ज्ञानयज्ञ का शुभारंभ किया। यह आयोजन ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ महाराज की 57वीं और राष्ट्रसंत महंत अवेद्यनाथ महाराज की 12वीं पुण्यतिथि समारोह के उपलक्ष्य में हो रहा है। कथा 23 से 29 सितंबर तक प्रतिदिन दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक चलेगी।
मुख्यमंत्री ने व्यासपीठ का पूजन करने के बाद श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में आम व्यक्ति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह पहचानना है कि क्या सत्य है और क्या असत्य। उनके अनुसार, सोशल मीडिया ने सत्य और असत्य के बीच अर्धसत्य की एक नई स्थिति पैदा कर दी है, जो भ्रम को और बढ़ाती है।
श्रीमद्भागवत कथा देती है जीवन को सही दिशा
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अर्धसत्य को सत्य नहीं माना जा सकता। ऐसे समय में जब व्यक्ति अनेक तरह की सूचनाओं और विचारों के बीच उलझ जाता है, श्रीमद्भागवत जैसी आध्यात्मिक कथाएं जीवन को दिशा देने का काम करती हैं।
उन्होंने कहा कि विज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन स्थायी शांति और जीवन के मूल प्रश्नों के उत्तर की तलाश आज भी मानव समाज को भारत की ओर देखने के लिए प्रेरित करती है। भारतीय परंपरा में कथा वाचन और श्रवण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहे, बल्कि जीवन और उसके मूल्यों को समझने का माध्यम भी रहे हैं।
मुख्यमंत्री के इस संबोधन का केंद्र श्रीमद्भागवत कथा और उससे मिलने वाली जीवन-दृष्टि रही। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में ऐसी कथाएं व्यक्ति को अपनी विरासत, संस्कार और जीवन मूल्यों से जोड़ती हैं। यही वजह है कि हजारों वर्षों से यह परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रही है।
मन, वचन और कर्म में एकरूपता जरूरी
योगी आदित्यनाथ ने कहा कि व्यक्ति के विचार और उसके आचरण में समानता होने पर उसके जीवन में स्पष्टता आती है। भारतीय परंपरा में इसे मनसा, वाचा और कर्मणा के रूप में समझाया गया है।
उन्होंने कहा कि जब मन, वचन और कर्म एक ही दिशा में होते हैं तो व्यक्ति के लिए अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना आसान होता है। इसके विपरीत इन तीनों में अंतर होने पर भीतर भ्रम पैदा होता है और व्यक्ति के लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसी स्थिति में मनुष्य की दशा ‘न घर की न घाट की’ जैसी हो जाती है। उनके अनुसार, श्रीमद्भागवत की कथा इसी भ्रम को दूर करने और जीवन की वास्तविकता को समझने में मदद करती है।
भक्ति, ज्ञान और निष्काम कर्म की प्रेरणा देती है श्रीमद्भागवत
मुख्यमंत्री ने कथा व्यास मलूकपीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य का गोरक्षपीठ में स्वागत किया। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण के वाचन और श्रवण की परंपरा करीब पांच हजार वर्ष पुरानी मानी जाती है। इसके माध्यम से ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म की प्रेरणा मिलती है।
उन्होंने शुकदेव जी और राजा परीक्षित का प्रसंग भी याद किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि हजारों वर्ष पहले राजा परीक्षित को शुकदेव जी ने श्रीमद्भागवत कथा सुनाई थी। समय बदला, परिस्थितियां बदलीं और अनेक उतार-चढ़ाव आए, लेकिन भारतीय संस्कृति में यह परंपरा बनी रही।
मुख्यमंत्री के अनुसार, श्रीमद्भागवत मनुष्य को जीवन की वास्तविकता का बोध कराने के साथ अज्ञान से मुक्ति की दिशा भी दिखाती है।
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच निकली शोभायात्रा
कथा के शुभारंभ से पहले गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में गोरखनाथ मंदिर के मुख्य मंदिर से दिग्विजयनाथ स्मृति भवन सभागार स्थित कथा स्थल तक श्रीमद्भागवत महापुराण की शोभायात्रा निकाली गई। शंख ध्वनि और वेदपाठी विद्यार्थियों के वैदिक मंत्रोच्चार से मंदिर परिसर का वातावरण भक्तिमय हो उठा।
कथा स्थल पर पहुंचने के बाद अखंड ज्योति स्थापित की गई। इसके बाद पोथी प्रतिष्ठा हुई और कथा व्यास स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य व्यासपीठ पर विराजमान हुए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य यजमानों ने व्यासपीठ तथा कथा व्यास का पूजन किया।
29 सितंबर तक चलेगी श्रीमद्भागवत कथा
वृंदावन से आए मलूकपीठाधीश्वर श्रीमद्जगद्गुरु द्वाराचार्य अग्रपीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य कथा का वाचन कर रहे हैं। श्रीमद्भागवत कथा प्रतिदिन दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक होगी और 29 सितंबर को इसका विराम होगा।
यह आयोजन महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि से जुड़े व्यापक कार्यक्रम का हिस्सा है। गोरखनाथ मंदिर में 24 से 30 सितंबर तक सप्तदिवसीय श्रद्धांजलि समारोह भी आयोजित किया जाना है।
संतों और श्रद्धालुओं की रही मौजूदगी
कार्यक्रम में जगद्गुरु स्वामी सुग्रीव किलाधीश अयोध्या के विश्वेश प्रपन्नाचार्य, रामलला सदन अयोध्या के जगद्गुरु राघवाचार्य, स्वामी श्रीधराचार्य, महंत नारायण गिरी, अवधेश दास, रामलखन दास, राजू दास, रामानंद दास, बालक दास और जयबख्श दास समेत अनेक संत, यजमान और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
गोरखनाथ मंदिर में शुरू हुई यह कथा धार्मिक आयोजन के साथ-साथ भारतीय ज्ञान परंपरा और जीवन मूल्यों पर केंद्रित संवाद का अवसर भी बनी है। अगले सात दिनों तक श्रद्धालु कथा का श्रवण करेंगे और 29 सितंबर को इसका समापन होगा।










