नई दिल्ली/21 अगस्त 2026: पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर अब भारत के एविएशन सेक्टर पर भी साफ दिखाई देने लगा है। अप्रैल से जून 2026 की पहली पूरी तिमाही में भारतीय एयरलाइंस की अंतरराष्ट्रीय यात्री संख्या में करीब 26 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि इसी अवधि में भारत से परिचालन करने वाली विदेशी एयरलाइंस का अंतरराष्ट्रीय यात्री यातायात करीब 7 प्रतिशत बढ़ गया। DGCA के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-जून के दौरान भारत आने-जाने वाले कुल अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की संख्या भी 10.5 प्रतिशत घटकर करीब 1.7 करोड़ रह गई।
यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अप्रैल-जून आम तौर पर अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिहाज से व्यस्त तिमाही मानी जाती है। इसके बावजूद भारतीय कंपनियों को दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ा—एक तरफ पश्चिम एशिया का संघर्ष और दूसरी ओर पाकिस्तान के एयरस्पेस पर जारी प्रतिबंधों के कारण कई अंतरराष्ट्रीय रूट लंबे और महंगे हो गए।
अंतरराष्ट्रीय यात्री संख्या में भारतीय एयरलाइंस पिछड़ीं
DGCA के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जून 2026 में भारत आने-जाने वाले यात्रियों की कुल संख्या करीब 1.9 करोड़ से घटकर 1.7 करोड़ रह गई। यानी कुल यातायात में 10.5 प्रतिशत की कमी आई। लेकिन इस गिरावट का असर भारतीय और विदेशी एयरलाइंस पर समान नहीं रहा।
भारतीय एयरलाइंस की अंतरराष्ट्रीय यात्री संख्या में करीब 26 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि विदेशी एयरलाइंस ने इसी अवधि में लगभग 7 प्रतिशत अधिक यात्रियों को संभाला। यही अंतर अब घरेलू विमानन कंपनियों के लिए चिंता का विषय बन रहा है।
एमिरेट्स को मिला बढ़ती मांग का फायदा
दुबई की एयरलाइन एमिरेट्स इस बदलाव से लाभ उठाने वाली प्रमुख विदेशी कंपनियों में रही। अप्रैल-जून 2026 के दौरान भारत आने-जाने वाले एमिरेट्स के यात्रियों की संख्या करीब 7 प्रतिशत बढ़कर 14.8 लाख हो गई। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा लगभग 13.8 लाख था।
इस बढ़त के पीछे यूएई की लंबे समय तक विदेशी एयरलाइंस की उड़ानों पर लगाई गई सीमाएं भी एक वजह रही हैं। ऐसे माहौल में एमिरेट्स के पास भारत और दुबई के बीच यातायात को संभालने की बेहतर स्थिति बनी रही।
एतिहाद पर सीमित रहा असर
अबू धाबी की एतिहाद एयरवेज के मामले में तस्वीर कुछ अलग रही। अप्रैल-जून 2026 में भारत आने-जाने वाले उसके यात्रियों की संख्या पिछले साल की करीब 8.5 लाख की तुलना में केवल 1,939 कम रही।
यानी जहां भारतीय एयरलाइंस को दोहरे दबाव का सामना करना पड़ा, वहीं कुछ खाड़ी और यूरोपीय एयरलाइंस अपनी क्षमता और रूट नेटवर्क के कारण अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रहीं।
एयर इंडिया ग्रुप की अंतरराष्ट्रीय यात्री संख्या 36% घटी
भारतीय एयरलाइंस में एयर इंडिया ग्रुप को सबसे बड़ा झटका लगा। एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस को मिलाकर ग्रुप ने अप्रैल-जून 2026 में करीब 27.6 लाख अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को सफर कराया। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा लगभग 43.3 लाख था।
इस तरह ग्रुप की अंतरराष्ट्रीय यात्री संख्या में करीब 36 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
एयर इंडिया की मुश्किलें केवल पश्चिम एशिया संकट तक सीमित नहीं रहीं। पिछले साल जून में अहमदाबाद विमान हादसे के बाद भी कंपनी ने कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में कटौती की थी। इसके अलावा पाकिस्तान के एयरस्पेस पर लगी पाबंदी ने भारत से पश्चिमी देशों की ओर जाने वाले कई रूटों को प्रभावित किया।
इंडिगो की अंतरराष्ट्रीय यात्री संख्या भी घटी
देश की सबसे बड़ी घरेलू एयरलाइन इंडिगो भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट से अछूती नहीं रही। अप्रैल-जून 2026 में कंपनी की अंतरराष्ट्रीय यात्री संख्या करीब 15.4 प्रतिशत घटकर लगभग 33.4 लाख रह गई। एक साल पहले इसी अवधि में यह संख्या करीब 39.5 लाख थी।
हालांकि घरेलू बाजार में इंडिगो की स्थिति मजबूत बनी हुई है। जून 2026 में कंपनी की घरेलू बाजार हिस्सेदारी 66.3 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इससे साफ है कि अंतरराष्ट्रीय परिचालन में आई कमजोरी का मतलब यह नहीं है कि घरेलू विमानन बाजार में कंपनी की पकड़ कमजोर हुई है।
पाकिस्तान एयरस्पेस बंद होने से भारतीय कंपनियों पर अतिरिक्त दबाव
भारतीय एयरलाइंस की परेशानी को समझने के लिए पाकिस्तान के एयरस्पेस पर जारी पाबंदी को भी देखना होगा। उत्तर भारत से पश्चिमी देशों की ओर जाने वाली कई उड़ानों के लिए पाकिस्तान का हवाई क्षेत्र महत्वपूर्ण रहा है। इसके बंद होने से विमानों को वैकल्पिक और लंबे रूट अपनाने पड़ते हैं।
लंबा रूट यानी ज्यादा ईंधन, अधिक उड़ान समय और परिचालन लागत में बढ़ोतरी। विमानन उद्योग के लिए यह मामूली बदलाव नहीं है, खासकर तब जब अंतरराष्ट्रीय परिचालन पहले ही भू-राजनीतिक तनाव से प्रभावित हो रहा हो।
लुफ्थांसा, स्विस और ब्रिटिश एयरवेज को मिला मौका
जहां भारतीय कंपनियां क्षमता और रूट संबंधी चुनौतियों से जूझ रही थीं, वहीं कुछ विदेशी एयरलाइंस को उपलब्ध विमान क्षमता का फायदा मिला। पश्चिम एशिया के कुछ रूटों पर परिचालन प्रभावित होने के कारण उनके पास विमानों को दूसरे बाजारों में लगाने की गुंजाइश बनी।
रिपोर्ट के मुताबिक, लुफ्थांसा, स्विस और ब्रिटिश एयरवेज ने भारत के लिए अपनी उड़ानों में बढ़ोतरी की। पाकिस्तान का एयरस्पेस बंद होने का सीधा असर इन विदेशी कंपनियों पर भारतीय एयरलाइंस जैसा नहीं पड़ा, जिससे उन्हें कुछ रूटों पर प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिली।
एविएशन सेक्टर के लिए क्या है संकेत?
ताजा आंकड़े बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय विमानन बाजार में केवल यात्री मांग ही निर्णायक नहीं होती। एयरस्पेस, ईंधन लागत, विमान उपलब्धता, रूट नेटवर्क और भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी एयरलाइंस के प्रदर्शन को तेजी से बदल सकती हैं।
अभी भारतीय एयरलाइंस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अंतरराष्ट्रीय परिचालन को सामान्य स्तर पर वापस लाने की है। पश्चिम एशिया की स्थिति और एयरस्पेस प्रतिबंधों में सुधार होने पर तस्वीर बदल सकती है, लेकिन फिलहाल आंकड़े विदेशी एयरलाइंस के पक्ष में बढ़त का संकेत दे रहे हैं।













