नई दिल्ली (Mon, 11 May 2026)। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक ऐसी अपील की है, जिसने आर्थिक और राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री ने लोगों से कम से कम एक साल तक सोना खरीदने से बचने, गैर-जरूरी विदेश यात्राएं टालने और ईंधन की बचत करने का आग्रह किया है।
हैदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में पीएम मोदी ने साफ शब्दों में कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत को अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखना होगा। उन्होंने कहा कि दुनिया जिस आर्थिक अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है, उसमें हर नागरिक की छोटी बचत भी देश की बड़ी ताकत बन सकती है।
प्रधानमंत्री की यह अपील ऐसे समय आई है जब ईरान-अमेरिका तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं। तेल 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ रहा है।
क्यों कहा गया- ‘एक साल तक सोना न खरीदें’?
पीएम मोदी ने कहा कि भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड इंपोर्टर्स में शामिल है और हर साल भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा सोना खरीदने में खर्च होती है। शादी-ब्याह और त्योहारों के दौरान यह आयात और तेजी से बढ़ जाता है।
उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय हित में हमें एक साल तक सोना न खरीदने का संकल्प लेना चाहिए। इससे विदेशी मुद्रा बचाने में मदद मिलेगी।”
दरअसल, भारत अपनी जरूरत का अधिकांश सोना विदेशों से आयात करता है। ऐसे में जब डॉलर महंगा होता है और तेल का आयात बिल बढ़ता है, तब सोने की खरीद अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डालती है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बड़े स्तर पर सोने का आयात घटता है तो चालू खाता घाटा और विदेशी मुद्रा पर पड़ने वाला दबाव कुछ हद तक कम हो सकता है।
ईरान-अमेरिका युद्ध का भारत पर कितना असर?
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद भारत की चिंता सिर्फ तेल कीमतों तक सीमित नहीं है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 88 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी तरह की रुकावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के ताजा शांति प्रस्ताव को खारिज किए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में घबराहट और बढ़ गई। तेल कीमतों में उछाल के साथ डॉलर मजबूत हुआ और रुपये पर दबाव बढ़ने लगा।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, पिछले कुछ हफ्तों में भारत का ईंधन आयात बिल तेजी से बढ़ा है। यही वजह है कि सरकार अब ऊर्जा बचत और आयात नियंत्रण को लेकर ज्यादा गंभीर नजर आ रही है।
वर्क फ्रॉम होम की वापसी पर जोर
प्रधानमंत्री मोदी ने कोरोना काल की आदतों को फिर से अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि कोविड-19 के दौरान देश ने वर्क फ्रॉम होम, वर्चुअल मीटिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसे विकल्पों को सफलतापूर्वक अपनाया था।
उन्होंने लोगों से अपील की कि जहां संभव हो वहां निजी वाहनों के बजाय मेट्रो, कारपूलिंग और इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल करें। इससे पेट्रोल और डीजल की खपत कम होगी और देश का आयात बिल घटेगा।
पीएम मोदी ने माल ढुलाई को भी सड़क मार्ग से रेलवे की तरफ शिफ्ट करने की जरूरत बताई। उनका मानना है कि इससे ईंधन की खपत में बड़ी कमी लाई जा सकती है।
Gold Price पर युद्ध का डबल असर
ईरान-अमेरिका संघर्ष का असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं है। इसका असर सोने की कीमतों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। आमतौर पर वैश्विक संकट के समय निवेशक सोने को सुरक्षित निवेश मानते हैं, इसलिए इसकी मांग बढ़ जाती है।
लेकिन इस बार स्थिति थोड़ी अलग है। तेल की कीमतों में उछाल के कारण दुनिया भर में महंगाई बढ़ने की आशंका है। इससे अमेरिकी फेडरल रिजर्व समेत कई केंद्रीय बैंक ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रख सकते हैं।
जब ब्याज दरें बढ़ती हैं तो निवेशक सोने के बजाय बॉन्ड और दूसरी ब्याज देने वाली संपत्तियों की तरफ आकर्षित होते हैं। यही वजह है कि भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने के बावजूद हाल के दिनों में स्पॉट गोल्ड की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, शांति समझौते की उम्मीदें कमजोर पड़ने और डॉलर मजबूत होने के बाद स्पॉट गोल्ड करीब 0.6 प्रतिशत तक फिसल गया।
सादगी, बचत और आत्मनिर्भरता का संदेश
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में सिर्फ सोना और ईंधन बचाने की बात नहीं की, बल्कि जीवनशैली में सादगी अपनाने पर भी जोर दिया। उन्होंने खाने के तेल की खपत कम करने, रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल घटाने और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की अपील की।
उन्होंने कहा कि वैश्विक संकट के इस दौर में आत्मनिर्भरता सिर्फ नारा नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार बन चुकी है।
उधर, केंद्र सरकार फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश कर रही है। हालांकि ऊर्जा क्षेत्र के जानकार मानते हैं कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है और आने वाले समय में उपभोक्ताओं को भी इसका असर झेलना पड़ सकता है।













