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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: आरोपपत्र की कॉपी न मिलने से नहीं मिलेगी स्वत: जमानत, जानिए अदालत ने क्या कहा

On: July 1, 2026
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, आरोपपत्र की कॉपी न मिलने से नहीं मिलेगी स्वत: जमानत
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नई दिल्ली, 01 जुलाई 2026। आपराधिक मामलों में स्वत: जमानत (Default Bail) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि यदि किसी आरोपी को आरोपपत्र (चार्जशीट) की कॉपी उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो केवल इसी आधार पर उसे स्वत: जमानत नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी द्वारा निर्धारित समय के भीतर चार्जशीट दाखिल कर देने के बाद स्वत: जमानत का अधिकार समाप्त हो जाता है, भले ही आरोपपत्र की प्रति आरोपी को बाद में मिले।

यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए अहम कानूनी मिसाल माना जा रहा है, जहां आरोपी केवल चार्जशीट की कॉपी न मिलने का हवाला देकर डिफॉल्ट बेल की मांग करते हैं।

स्वत: जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। हाई कोर्ट ने पहले ही यह कहते हुए आरोपी की स्वत: जमानत की याचिका खारिज कर दी थी कि आरोपपत्र की कॉपी न मिलना, डिफॉल्ट बेल का वैध आधार नहीं बनता।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत यदि तय समयसीमा के भीतर आरोपपत्र दाखिल कर दिया गया है, तो बाद में उसकी अतिरिक्त प्रति जमा न करने या आरोपी को कॉपी देने में हुई देरी से चार्जशीट अमान्य नहीं हो जाती।

BNSS के तहत कब मिलता है स्वत: जमानत का अधिकार?

अदालत ने कहा कि स्वत: जमानत का अधिकार केवल उस स्थिति में उत्पन्न होता है, जब जांच एजेंसी कानून में निर्धारित 60 या 90 दिनों की अवधि के भीतर आरोपपत्र दाखिल नहीं कर पाती।

यदि जांच एजेंसी निर्धारित समयसीमा के अंदर बीएनएसएस की धारा 193(3) के तहत चार्जशीट दाखिल कर देती है, तो आरोपी का डिफॉल्ट बेल का अधिकार स्वत: समाप्त हो जाता है। इसके बाद चार्जशीट की कॉपी मिलने या न मिलने का प्रश्न स्वत: जमानत के अधिकार को प्रभावित नहीं करता।

3.81 करोड़ रुपये के साइबर फ्रॉड मामले में हुई सुनवाई

यह मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज करीब 3.81 करोड़ रुपये के साइबर फ्रॉड से जुड़ा है। इस मामले में गिरफ्तार आरोपी ने बॉम्बे हाई कोर्ट में स्वत: जमानत की मांग करते हुए कहा था कि हालांकि जांच एजेंसी ने समयसीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल कर दी थी, लेकिन उसे उसकी कॉपी उपलब्ध नहीं कराई गई।

हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और याचिका खारिज कर दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने भी हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी की दलील को अस्वीकार कर दिया।

फैसले का क्या होगा असर?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह कानूनी स्थिति और स्पष्ट हो गई है कि स्वत: जमानत का अधिकार केवल चार्जशीट दाखिल होने की समयसीमा से जुड़ा है, न कि उसकी प्रति आरोपी को कब उपलब्ध कराई गई। अदालत के इस निर्णय से भविष्य में डिफॉल्ट बेल से जुड़े मामलों में एक स्पष्ट न्यायिक मार्गदर्शन मिलेगा और केवल आरोपपत्र की कॉपी न मिलने के आधार पर स्वत: जमानत की मांग करना आसान नहीं होगा।

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