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Vice President Election 2025: किसका पलड़ा भारी? संसद के नंबर गेम से समझिए पूरा गणित

On: August 24, 2025
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Vice President Election 2025: किसका पलड़ा भारी? संसद के नंबर गेम से समझिए पूरा गणित
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नई दिल्ली, 18 अगस्त 2025। देश की राजनीति का माहौल इन दिनों बेहद गर्म है। वजह साफ है—Vice President Election 2025 का ऐलान हो चुका है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार बनाया है। दूसरी ओर विपक्षी खेमे यानी INDIA गठबंधन अब तक अपने प्रत्याशी का नाम तय नहीं कर पाया है। यही देरी सत्ता और विपक्ष के बीच रणनीतिक खींचतान को और दिलचस्प बना रही है।
लोगों के मन में सवाल साफ है: Vice President Election 2025 में किसका पलड़ा भारी है और संसद का नंबर गेम आखिर किस दिशा की ओर इशारा कर रहा है?


लोकसभा-राज्यसभा का नंबर गेम: जीत की बुनियाद

उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—के सांसद मिलकर करते हैं। लोकसभा की कुल सीटें 543 हैं, लेकिन इस समय पश्चिम बंगाल की बशीरहाट सीट खाली है, यानी वर्तमान में 542 सांसद सक्रिय हैं। राज्यसभा की कुल 245 सीटों में से 6 सीटें खाली हैं (चार जम्मू-कश्मीर की, एक-एक झारखंड और पंजाब की)। यानी दोनों सदनों को मिलाकर कुल 781 सांसद वोट देने के पात्र हैं।

इस चुनाव में जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार को 391 सांसदों का समर्थन हासिल करना जरूरी है। यह आंकड़ा केवल गणित नहीं बल्कि पूरे चुनावी परिदृश्य का केंद्र बिंदु है।


NDA बनाम INDIA: आंकड़ों की टक्कर

गौर से देखें तो भाजपा और उसके सहयोगियों का गठबंधन NDA इस समय बेहद मजबूत स्थिति में है।

  • NDA + सहयोगी सांसद : लगभग 427 (लोकसभा से 293 और राज्यसभा से 134)।
  • INDIA गठबंधन : करीब 355 सांसद (लोकसभा 249 और राज्यसभा 106)।

यहां तक कि कागज़ी आंकड़ों के हिसाब से NDA का पलड़ा भारी दिख रहा है। लेकिन भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि सिर्फ नंबर ही अंतिम तस्वीर तय नहीं करते। क्रॉस वोटिंग और तटस्थ दलों का रुख कई बार अप्रत्याशित परिणाम दे चुका है। यही कारण है कि इस बार भी 130 से ज्यादा सांसदों की स्थिति बेहद अहम मानी जा रही है, जिन्होंने अब तक खुलकर किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं जताया है।


NDA की रणनीति: विपक्ष से भी समर्थन की कोशिश

भाजपा का शीर्ष नेतृत्व विपक्षी दलों से भी बातचीत कर रहा है। इसका संदेश साफ है कि पार्टी उपराष्ट्रपति चुनाव को महज़ औपचारिक जीत नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक पकड़ और सर्वसम्मति का प्रतीक बनाना चाहती है। पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पदों पर उम्मीदवार उतारने से पहले विपक्ष को साधने का प्रयास किया है। इस बार भी यही सिलसिला जारी है।


INDIA गठबंधन की उलझन

विपक्षी खेमे की सबसे बड़ी चुनौती है—उम्मीदवार का चयन। अब तक INDIA गठबंधन यह तय नहीं कर पाया है कि किस चेहरे को मैदान में उतारा जाए। विपक्षी दलों की आंतरिक खींचतान, क्षेत्रीय समीकरण और ‘कौन सर्वमान्य चेहरा होगा’—इन सबने निर्णय को जटिल बना दिया है। अगर वे किसी मजबूत, अनुभवी और व्यापक पहचान वाले उम्मीदवार को लाते हैं, तो मुकाबला दिलचस्प बन सकता है। लेकिन देरी की वजह से राजनीतिक संदेश साफ जा रहा है कि विपक्ष तैयारियों में पीछे है।

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कौन हैं सीपी राधाकृष्णन?

एनडीए प्रत्याशी सीपी राधाकृष्णन लंबे समय से राजनीति और सामाजिक जीवन में सक्रिय रहे हैं। 2024 में वे महाराष्ट्र के राज्यपाल बने। उससे पहले झारखंड में राज्यपाल का दायित्व उन्होंने निभाया। राधाकृष्णन ने बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातक किया है और 1970 के दशक से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े हुए हैं। 2004 से 2007 के बीच उन्होंने भाजपा तमिलनाडु के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में काम किया।
उनका लंबा राजनीतिक अनुभव और संगठनात्मक पकड़ NDA को भरोसा दिलाती है कि वे उपराष्ट्रपति पद के लिए एक मजबूत और स्वीकार्य चेहरा साबित होंगे।


क्रॉस वोटिंग का फैक्टर

भारतीय राजनीति में क्रॉस वोटिंग हमेशा से दिलचस्प पहलू रहा है। कई बार सांसद पार्टी लाइन से हटकर मतदान करते हैं। यही कारण है कि भले ही NDA को संख्यात्मक बढ़त मिली हो, लेकिन अंतिम नतीजे पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी। अगर विपक्ष कोई बड़ा नाम सामने लाता है तो कुछ सांसद क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं। यही वजह है कि दोनों खेमे अपने सांसदों को साधने में व्यस्त हैं।


Vice President Election 2025 निष्कर्ष: क्या NDA की जीत पक्की है?

संसदीय गणित कहता है कि NDA उम्मीदवार की राह अपेक्षाकृत आसान है। लेकिन राजनीति अक्सर केवल आंकड़ों का खेल नहीं होती। तटस्थ सांसदों का झुकाव और विपक्ष का अंतिम दांव, दोनों ही इस मुकाबले को रोमांचक बना सकते हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि Vice President Election 2025 केवल उपराष्ट्रपति चुनने की औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह आने वाले वर्षों के लिए संसद में सत्ता और विपक्ष की ताक़त का भी प्रतीक बनने जा रहा है।

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