नई दिल्ली/05 सितंबर 2026: शिक्षक की भूमिका सिर्फ किताबों का पाठ पढ़ाने और परीक्षा की तैयारी कराने तक सीमित नहीं है। बच्चे दिनभर क्या करते हैं, उनकी आदतों में क्या बदलाव आ रहा है और वे किन चीजों को लेकर उत्साहित या परेशान हैं—इन पहलुओं को समझना भी शिक्षा का अहम हिस्सा है। शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर PM मोदी शिक्षक दिवस संदेश के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षकों को इसी व्यापक जिम्मेदारी की याद दिलाई।
प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चुने गए शिक्षकों से बातचीत में बच्चों में बढ़ते स्क्रीन टाइम और नशे की आदत को लेकर चिंता जताई। उन्होंने शिक्षकों से कहा कि वे सिलेबस से थोड़ा बाहर निकलकर बच्चों के व्यवहार और उनके दैनिक जीवन पर भी नजर रखें। इस वर्ष 82 शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चुना गया है। इन शिक्षकों से प्रधानमंत्री ने शुक्रवार शाम अपने आवास पर मुलाकात की।
PM मोदी शिक्षक दिवस संदेश में बच्चों के व्यवहार पर जोर
प्रधानमंत्री ने कहा कि बच्चों की शिक्षा को केवल उनके शैक्षणिक प्रदर्शन से आंकना पर्याप्त नहीं है। शिक्षक अगर बच्चों के व्यवहार और रोजमर्रा की आदतों को समझेंगे, तो कई समस्याओं की पहचान समय रहते की जा सकती है।
बातचीत के दौरान संयुक्त परिवारों के कम होते दायरे का भी उल्लेख हुआ। प्रधानमंत्री ने संकेत दिया कि जब बच्चों को परिवार के स्तर पर पहले जैसी व्यापक संगत और मार्गदर्शन नहीं मिल पाता, तब स्कूल और शिक्षक की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।
उन्होंने शिक्षकों से आग्रह किया कि बच्चों के व्यवहार में अचानक आने वाले बदलावों को नजरअंदाज न किया जाए। खासकर नशे जैसी समस्या के मामले में यह समझने की कोशिश होनी चाहिए कि बच्चा आखिर किस वजह से उस दिशा में जा रहा है। केवल डांटने या रोकने के बजाय उसे समझना और जरूरत पड़ने पर इस आदत से बाहर निकलने में मदद करना ज्यादा प्रभावी हो सकता है।
बचपन की जिज्ञासा को सही दिशा दें शिक्षक
प्रधानमंत्री ने बच्चों की स्वाभाविक जिज्ञासा और मासूमियत का जिक्र करते हुए कहा कि इसे सुरक्षित रखना भी शिक्षक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। बच्चों में सीखने और नई चीजें जानने की इच्छा स्वाभाविक होती है। शिक्षक इस जिज्ञासा को सही दिशा देकर उनके व्यक्तित्व और सोच के विकास में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि बच्चों को सिर्फ उत्तर बताने के बजाय सवाल पूछने, प्रयोग करने और अपनी बात रखने के अवसर दिए जाने चाहिए। यही प्रक्रिया उन्हें आत्मविश्वासी और जिम्मेदार नागरिक बनाने की दिशा में आगे ले जा सकती है।
स्क्रीन टाइम को लेकर अभिभावकों से बात करें शिक्षक
बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम पर प्रधानमंत्री ने विशेष चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज स्क्रीन टाइम लगभग हर उम्र के व्यक्ति के लिए चुनौती बन रहा है, लेकिन बच्चों में इसकी अत्यधिक आदत ज्यादा चिंता का विषय है।
प्रधानमंत्री ने शिक्षकों से कहा कि वे अभिभावकों से भी इस विषय पर बातचीत करें। माता-पिता से यह जानना जरूरी है कि बच्चा मोबाइल या दूसरी स्क्रीन पर कितना समय बिताता है और क्या वह देर रात तक फोन का इस्तेमाल करता रहता है।
उन्होंने बच्चों को स्क्रीन की दुनिया से बाहर लाने के लिए खेलकूद, शारीरिक गतिविधियों और रचनात्मक कार्यों से जोड़ने का सुझाव दिया। बच्चों को मैदान में खेलने, कुछ नया बनाने और अपनी रुचि के दूसरे काम करने के अवसर मिलें तो स्क्रीन पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की जा सकती है।
कक्षा से बाहर की दुनिया से भी जोड़ें बच्चों को
राष्ट्रीय शिक्षा नीति की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने शिक्षा को कक्षा की चारदीवारी से बाहर ले जाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को वास्तविक दुनिया के कौशल और कामकाज के विभिन्न रूपों से परिचित कराना जरूरी है।
इस तरह के अनुभव बच्चों को यह समझने में मदद करते हैं कि किताबों में सीखी गई चीजों का वास्तविक जीवन से क्या संबंध है। साथ ही उनमें जिम्मेदारी, संवाद और समस्या का समाधान खोजने जैसी क्षमताएं भी विकसित होती हैं।
बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री ने एक शिक्षिका से छात्रों को पब्लिक स्पीकिंग सिखाने के अनुभव के बारे में भी सवाल किए। आमने-सामने बातचीत के दौरान शिक्षिका प्रधानमंत्री को देखकर थोड़ी झिझकती नजर आईं। बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व और प्रभाव के कारण वह कुछ घबरा गई थीं।
इस पर प्रधानमंत्री ने सहज अंदाज में उनसे पूछा कि क्या उनमें ‘औरा’ नहीं होना चाहिए। शिक्षिका ने हामी भरी। इस हल्के-फुल्के संवाद के दौरान माहौल कई बार हंसी-ठहाकों से गूंज उठा। गंभीर विषयों पर चर्चा के बीच बातचीत का यह अंदाज कार्यक्रम को सहज बनाता नजर आया।
कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री का संदेश साफ था—शिक्षक सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा करने वाले व्यक्ति नहीं हैं। वे बच्चों के व्यवहार, जिज्ञासा, आदतों और व्यक्तित्व को आकार देने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे समय में जब मोबाइल, इंटरनेट और दूसरी डिजिटल आदतें बचपन का बड़ा हिस्सा बनती जा रही हैं, शिक्षक और अभिभावक दोनों की सजगता पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गई है।












