गोरखपुर/24 सितंबर 2026: गोरखपुर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारतीय ज्ञान परंपरा, उसकी ऐतिहासिक विरासत और उसके संरक्षण की जरूरत पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि भारत का वैभव केवल उसकी भौतिक संपदा तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी वास्तविक शक्ति उसकी ज्ञान परंपरा में निहित थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि विदेशी आक्रांताओं ने भारत की संपदा के साथ-साथ उसकी ज्ञान परंपरा को भी नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया।
मुख्यमंत्री गुरुवार को गोरखनाथ मंदिर परिसर स्थित महंत दिग्विजयनाथ स्मृति भवन सभागार में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा का वर्तमान परिप्रेक्ष्य’ विषय पर आयोजित सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे थे। यह आयोजन युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित समसामयिक विषयों की सम्मेलन श्रृंखला का पहला कार्यक्रम था।
भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक तकनीक से जोड़ने पर जोर
सीएम योगी ने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि भारत अपनी ज्ञान परंपरा को पहचाने, उससे जुड़े प्रमाणों को सुरक्षित रखे और आधुनिक तकनीक के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाए। उन्होंने शिक्षण संस्थानों और समाज से इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा को केवल अतीत की चीज मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। इसे वर्तमान आवश्यकताओं के साथ जोड़ते हुए आगे बढ़ाने की जरूरत है। उनके मुताबिक, पांडुलिपियों, शिलालेखों, ताम्रपत्रों और अन्य प्राचीन स्रोतों में मौजूद सामग्री को संरक्षित और डिजिटल स्वरूप में उपलब्ध कराना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
आक्रमणों के पीछे ज्ञान परंपरा को नुकसान पहुंचाने का भी उद्देश्य बताया
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में रामायण काल के दंडकारण्य में ऋषियों के आश्रमों पर हुए हमलों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत पर अलग-अलग कालखंडों में हुए आक्रमणों के पीछे केवल संपत्ति हासिल करने की मंशा नहीं थी, बल्कि उसकी सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा को कमजोर करने के प्रयास भी हुए।
सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने इसे सनातन परंपरा पर हमले के व्यापक संदर्भ से जोड़ा। उन्होंने कहा कि भारत की परंपराओं और ज्ञान व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की कोशिशें अलग-अलग दौर में अलग-अलग तरीकों से हुईं।
ब्रिटिश काल का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि उस दौर में तरीका बदल गया और भारतीयों को उनकी भाषा, चिकित्सा पद्धति, परंपराओं और जड़ों को लेकर भ्रमित करने का प्रयास हुआ। उन्होंने संस्कृत और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के स्थान पर अंग्रेजी तथा आधुनिक चिकित्सा को प्राथमिकता दिए जाने का भी उल्लेख किया।
पाणिनि से चाणक्य तक ज्ञान की विरासत का किया उल्लेख
सीएम योगी ने कहा कि प्राचीन भारत में भाषा, व्याकरण, अर्थशास्त्र, विज्ञान, खगोल, आयुष, ज्योतिष, शिल्प और तकनीकी समेत अनेक क्षेत्रों में ज्ञान की समृद्ध परंपरा रही है।
उन्होंने नई पीढ़ी को पाणिनि, पतंजलि, आयुर्वेद के आचार्यों और चाणक्य के अर्थशास्त्र जैसी विरासत से परिचित कराने की जरूरत बताई। मुख्यमंत्री ने नैमिषारण्य का उल्लेख करते हुए कहा कि करीब तीन हजार वर्ष पहले 88 हजार ऋषियों के एकत्र होने की परंपरा भी भारतीय ज्ञान के श्रवण और लिपिबद्ध करने की प्रक्रिया से जुड़ी रही है।
उन्होंने कहा कि इस विरासत का संरक्षण केवल इतिहास को बचाने का काम नहीं है, बल्कि लोकमंगल की दृष्टि से इसके उपयोगी पहलुओं को समझने और दुनिया तक पहुंचाने का प्रयास भी होना चाहिए।
भूत, वर्तमान और भविष्य पर चिंतन की परंपरा
मुख्यमंत्री ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध पंक्तियों—‘हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी’—का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय विद्वानों ने हमेशा भूत, वर्तमान और भविष्य से जुड़े विषयों पर चिंतन किया है।
उन्होंने कहा कि भारतीय ऋषि परंपरा ने ज्ञान को अलग-अलग माध्यमों से संरक्षित करने का प्रयास किया। भारत में विद्या को केवल अक्षर ज्ञान या भौतिक उपलब्धि का साधन नहीं माना गया, बल्कि इसे मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला माध्यम भी माना गया।
ज्ञान की परंपरा के कारण विश्वगुरु कहलाता था भारत
मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि भारत के पास प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता रही है, लेकिन देश को विश्वगुरु की पहचान केवल प्राकृतिक संपदा के कारण नहीं मिली। उनके अनुसार भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी ज्ञान परंपरा रही।
उन्होंने तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों का उल्लेख किया। साथ ही काशी, उज्जैन और कांची को भी ज्ञान के प्रमुख केंद्रों में शामिल बताया।
कुंभ की परंपरा का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इसे केवल स्नान तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक-त्र्यंबकेश्वर में संतों और विद्वानों के बीच ज्ञान, शोध और नवाचार से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श की परंपरा रही है।
योग को वैश्विक पहचान मिलने का किया उल्लेख
मुख्यमंत्री ने योग को भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक पहचान से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में योग को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में पहल की।
उन्होंने कहा कि 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाना भारतीय योग परंपरा की वैश्विक पहुंच का उदाहरण है। मुख्यमंत्री ने बताया कि योग के साथ दुनिया के अनेक देशों के लोग जुड़ रहे हैं।
उन्होंने आयुष मंत्रालय के गठन और आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, सिद्ध, यूनानी तथा होम्योपैथी जैसी चिकित्सा पद्धतियों को संस्थागत पहचान मिलने का भी उल्लेख किया।
एक लाख से अधिक पांडुलिपियों के संरक्षण का दावा
सीएम योगी ने बताया कि काशी स्थित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में एक लाख से अधिक प्राचीन पांडुलिपियां एकत्र हैं और इनके संरक्षण तथा डिजिटाइजेशन का कार्य चल रहा है।
उन्होंने कहा कि केवल विश्वविद्यालयों में ही नहीं, बल्कि परिवारों, विद्वानों के घरों, प्राचीन मठों और मंदिरों में भी महत्वपूर्ण ज्ञान सामग्री मौजूद है। अयोध्या, प्रयागराज, मथुरा-वृंदावन और लखनऊ सहित कई स्थानों पर पांडुलिपियों, ताम्रपत्रों और शिलालेखों की मौजूदगी का भी उन्होंने उल्लेख किया।
‘जो कहें, प्रमाण के साथ कहें’
भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने की चुनौती पर मुख्यमंत्री ने कहा कि किसी भी दावे को प्रमाण के साथ प्रस्तुत करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि ज्ञान की इस विरासत को आगे बढ़ाने के दौरान तीन स्तरों पर चुनौती सामने आ सकती है—पहला प्रमाण और सत्य का पक्ष, दूसरा उन लोगों का विरोध जो दावों को असत्य ठहराने का प्रयास करेंगे और तीसरा दुष्प्रचार के माध्यम से संशय पैदा करने का प्रयास।
मुख्यमंत्री ने कहा कि आधुनिक तकनीक इन चुनौतियों से निपटने में मददगार हो सकती है। इसलिए भारतीय ज्ञान परंपरा को समय के अनुरूप तकनीक से जोड़ना जरूरी है।
नई पीढ़ी को ज्ञान-धरोहर से जोड़ने का आह्वान
सीएम योगी ने कहा कि वर्तमान समय भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी धरोहर को संरक्षित करने और नई पीढ़ी को उससे परिचित कराने के लिए उपयुक्त है। उन्होंने शिक्षण संस्थानों से भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित शोध, संरक्षण और अध्ययन को बढ़ावा देने का आह्वान किया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि अपनी ऋषि परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और भारतीय समाज को उसकी जड़ों से जोड़ने के लिए ज्ञान परंपरा से संबंधित शोध पीठों और संस्थागत प्रयासों को आगे बढ़ाना आवश्यक है।
उन्होंने जोर दिया कि भारत की प्राचीन ज्ञान-संपदा को प्रमाणों के साथ संरक्षित करते हुए आधुनिक तकनीक के माध्यम से नई पीढ़ी और वैश्विक समाज तक पहुंचाना समय की महत्वपूर्ण जरूरत है।











