नई दिल्ली, 25 फरवरी 2026 (बुधवार)। देश की सर्वोच्च अदालत में बुधवार को उस समय असामान्य सख्ती दिखी, जब न्यायपालिका पर NCERT विवाद को लेकर शीर्ष न्यायालय ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने की पुष्टि की। कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की नई पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार संबंधी अध्याय पर आपत्ति जताते हुए भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा—“किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की अनुमति नहीं देंगे।”
अदालत कक्ष में मौजूद वकीलों और न्यायाधीशों के बीच यह मुद्दा अचानक नहीं उठा, बल्कि पिछले कुछ दिनों से कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ था। बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इस मामले का उल्लेख मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बाग्ची की पीठ के समक्ष किया। तभी यह स्पष्ट हुआ कि अदालत पहले ही इस पर स्वतः संज्ञान ले चुकी है।
न्यायपालिका पर NCERT विवाद: सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यह “एक सोची-समझी साजिश” प्रतीत होती है। हालांकि उन्होंने विस्तृत टिप्पणी से परहेज़ किया और जोड़ा—“कानून अपना काम करेगा।”
पीठ के सदस्य जस्टिस जोयमाल्या बाग्ची ने भी चिंता जताते हुए कहा कि पुस्तक की सामग्री प्रथम दृष्टया संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) की भावना के विपरीत लगती है। यह टिप्पणी अपने आप में गंभीर मानी जा रही है, क्योंकि संविधान का मूल ढांचा सिद्धांत न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संस्थागत गरिमा की रक्षा का आधार माना जाता है।
अदालत में माहौल कुछ क्षणों के लिए बेहद गंभीर हो गया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि “बार और बेंच दोनों चिंतित हैं, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश भी व्यथित हैं।” उन्होंने दो टूक शब्दों में जोड़ा—“किसी भी कीमत पर संस्था की गरिमा को धूमिल नहीं होने देंगे।”
क्या है विवादित अध्याय?
यह मामला एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की नई पुस्तक से जुड़ा है। संबंधित अध्याय में न्यायपालिका के सामने मौजूद चुनौतियों का उल्लेख करते हुए भ्रष्टाचार, लंबित मामलों का भारी बोझ (pendency of cases) और न्यायाधीशों की संख्या की कमी जैसे मुद्दों का जिक्र किया गया है।
पुस्तक में कहा गया है कि न्यायिक प्रणाली कई संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही है। हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ताओं का तर्क है कि अध्याय का प्रस्तुतीकरण एकतरफा (selective) है और यह न्यायपालिका को केंद्र में रखकर नकारात्मक छवि प्रस्तुत करता है।
वरिष्ठ वकीलों की आपत्ति
कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि “इस संस्था का सदस्य होने के नाते मुझे अत्यंत दुख हुआ कि आठवीं कक्षा के छात्रों को न्यायिक भ्रष्टाचार के बारे में इस तरह पढ़ाया जा रहा है। यह अध्याय पूरी तरह निंदनीय है।” उन्होंने पुस्तक की प्रति भी पीठ के समक्ष रखी।
अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि पुस्तक में चयनात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया है। उनके अनुसार, “यदि भ्रष्टाचार एक सामाजिक समस्या है तो केवल न्यायपालिका को ही क्यों केंद्र में रखा गया? नौकरशाही, राजनीति और अन्य सार्वजनिक संस्थानों का उल्लेख क्यों नहीं?”
यह तर्क अदालत में गूंजता रहा—क्या यह अकादमिक विमर्श है या संस्थागत छवि पर प्रश्नचिन्ह?
स्वतः संज्ञान: अदालत का सक्रिय रुख
मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्वतः संज्ञान ले चुका है। उन्होंने अधिवक्ताओं से एक दिन का इंतजार करने को कहा और आश्वासन दिया कि अदालत को पूरी जानकारी है।
भारत की न्यायिक परंपरा में स्वतः संज्ञान लेना एक असाधारण कदम माना जाता है, जो तब उठाया जाता है जब अदालत को लगता है कि कोई मुद्दा व्यापक जनहित या संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा है। इस संदर्भ में अदालत का रुख यह संकेत देता है कि वह न्यायपालिका की संस्थागत साख (institutional credibility) को लेकर अत्यंत सजग है।
व्यापक बहस की पृष्ठभूमि
दरअसल, शिक्षा और संस्थाओं की आलोचनात्मक समीक्षा के बीच संतुलन (balance) हमेशा एक संवेदनशील विषय रहा है। एक ओर लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थाओं की आलोचना को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा माना जाता है, वहीं दूसरी ओर न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा संविधान के मूल ढांचे का अभिन्न अंग है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल एक अध्याय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह शिक्षा नीति, पाठ्यक्रम निर्माण और संस्थागत जिम्मेदारी पर भी व्यापक बहस को जन्म दे सकता है।
आगे क्या?
अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली कार्यवाही पर टिकी हैं। क्या अदालत एनसीईआरटी से स्पष्टीकरण मांगेगी? क्या पाठ्यपुस्तक में संशोधन होगा? या फिर यह मामला अकादमिक स्वतंत्रता बनाम संस्थागत गरिमा की बड़ी बहस का रूप लेगा?
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि न्यायपालिका पर NCERT विवाद ने देश की सर्वोच्च अदालत को सक्रिय कर दिया है, और आने वाले दिनों में यह मुद्दा कानूनी, शैक्षिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा के केंद्र में रहेगा।












