नई दिल्ली (Wed, 22 Apr 2026)। भारतीय रेलवे अब सिर्फ सफर का जरिया नहीं, बल्कि सुरक्षित और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की नई मिसाल बनने की ओर बढ़ रहा है। रेल हादसों में 90% कमी का दावा करते हुए रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि बीते एक दशक में सुरक्षा के मोर्चे पर ऐतिहासिक सुधार हुआ है—लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है।
‘ऑल इंडिया ट्रैक मेंटेनर्स कॉन्फ्रेंस’ में बोलते हुए उन्होंने साफ कहा कि अब लक्ष्य सिर्फ कमी लाना नहीं, बल्कि रेल दुर्घटनाओं को “सिंगल डिजिट” तक सीमित करना है। यानी हादसे अपवाद बनें, नियम नहीं।
पटरियों का बड़ा बदलाव: 36,000 किमी नई ट्रैक और मशीनों पर जोर
रेल मंत्री ने बताया कि पिछले दस वर्षों में करीब 36,000 किलोमीटर नई पटरियां बिछाई गई हैं। यह सिर्फ विस्तार नहीं, बल्कि गुणवत्ता सुधार का भी संकेत है।
उन्होंने यह भी बताया कि फिलहाल रेलवे के पास लगभग 1,800 ट्रैक मशीनें हैं, जिन्हें बढ़ाकर 3,000 करने की योजना है। उनका मानना है कि जैसे-जैसे मशीनों की संख्या बढ़ेगी, वैसे-वैसे पटरियों की निगरानी और मरम्मत पहले से कहीं ज्यादा तेज और सटीक हो जाएगी।
थोड़ा सहज शब्दों में कहें तो—जहां पहले इंसानी अनुमान पर निर्भरता थी, वहां अब तकनीक निर्णायक भूमिका निभा रही है।
‘रेल-कम-रोड व्हीकल’: काम का तरीका बदलने की तैयारी
रेलवे अब पारंपरिक तरीकों को पीछे छोड़ते हुए नई तकनीकों को अपनाने में तेजी दिखा रहा है। इसी दिशा में ‘रेल-कम-रोड व्हीकल’ एक बड़ा प्रयोग माना जा रहा है।
इस सिस्टम के तहत कर्मचारी अपने औजार सीधे वाहन में रखकर ट्रैक तक पहुंच सकेंगे और आरामदायक तरीके से निरीक्षण कर सकेंगे। इसका पायलट प्रोजेक्ट गुजरात के भावनगर डिवीजन में शुरू किया गया है, जहां शुरुआती परीक्षण के बाद दो वाहन तैनात किए गए हैं।
यह बदलाव सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि कार्यस्थल की सुरक्षा और दक्षता दोनों को बेहतर करने की दिशा में कदम है।
ड्रोन और आधुनिक गेज: अब अंदाज नहीं, सटीक डेटा पर काम
रेलवे ने ट्रैक मॉनिटरिंग के लिए ड्रोन तकनीक और एडवांस गेज सिस्टम का इस्तेमाल भी बढ़ा दिया है। इन गेज के जरिए पटरियों के मोड़ और क्रॉसिंग की बेहद सटीक माप संभव हो रही है।
नई तकनीकों में 60 किलो रेल, 90 यूटीएस मजबूती वाली रेल और 207 मीटर लंबे रेल पैनल शामिल हैं। इसके अलावा घर्षण-मुक्त स्विच और WCMS (वेल्डेबल CMS) जैसी प्रणालियां भी तेजी से लागू की जा रही हैं।
यह सब मिलकर रेलवे को उस दिशा में ले जा रहा है, जहां सुरक्षा केवल लक्ष्य नहीं, बल्कि सिस्टम का हिस्सा बन जाती है।
कर्मचारियों की सुरक्षा भी प्राथमिकता, ‘रक्षक’ से आगे नया सिस्टम
रेल मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि रेलवे सुरक्षा का मतलब सिर्फ यात्रियों की सुरक्षा नहीं है—बल्कि उन कर्मचारियों की भी सुरक्षा है, जो दिन-रात ट्रैक पर काम करते हैं।
पहले ‘रक्षक’ नाम का VHF आधारित सिस्टम लागू किया गया था, लेकिन इसमें कुछ तकनीकी सीमाएं सामने आईं—खासकर पहाड़ी और घुमावदार इलाकों में।
अब इसकी जगह एक नया मोबाइल फोन आधारित सिस्टम तैयार किया गया है, जो ज्यादा भरोसेमंद और प्रभावी बताया जा रहा है। फिलहाल इसका परीक्षण जारी है।
निष्कर्ष: सुरक्षा अब विकल्प नहीं, रेलवे की पहचान बन रही
रेल हादसों में 90% कमी का आंकड़ा निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इससे भी बड़ा संदेश यह है कि भारतीय रेलवे अब “रिएक्टिव” नहीं, बल्कि “प्रोएक्टिव” सोच के साथ आगे बढ़ रही है।
तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर और मानव संसाधन—तीनों को साथ लेकर चलने की रणनीति साफ दिख रही है।
अब देखना यह है कि क्या सिंगल डिजिट का लक्ष्य भी उतनी ही मजबूती से हासिल हो पाता है, जितनी मजबूती से इसकी घोषणा की गई है।












