नई दिल्ली, 25 जनवरी 2026 (रविवार)। 77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की निरंतर आर्थिक प्रगति पर भरोसा जताया और कहा कि भारत जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने आत्मनिर्भरता, स्वदेशी, कर सुधार, श्रम संहिताओं, डिजिटल सशक्तिकरण और जनभागीदारी को इस परिवर्तन की आधारशिला बताया।
राष्ट्रपति ने कहा कि विश्व परिदृश्य में उथल-पुथल के बावजूद भारत ने विकास की रफ्तार कायम रखी है। देश विश्वस्तरीय इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश कर अपनी आर्थिक संरचना का उच्चस्तरीय पुनर्निर्माण कर रहा है। उनके शब्दों में, आत्मनिर्भरता अब नारा नहीं, नीति और व्यवहार का हिस्सा बन चुकी है।
भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था: जीएसटी, श्रम सुधार और इज ऑफ लिविंग पर जोर
राष्ट्रपति मुर्मु ने जीएसटी व्यवस्था में हालिया सुधारों का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वतंत्रता के बाद आर्थिक एकीकरण की दिशा में यह सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में रहा है। इससे व्यापार सुगमता और कर पारदर्शिता बढ़ी है। साथ ही, चार श्रम संहिताओं (लेबर कोड) के माध्यम से श्रमिकों और उद्यमियों—दोनों के हितों को संतुलित करने की कोशिश हुई है, जिससे विकास को गति मिलेगी।
उन्होंने बताया कि अनावश्यक नियमों और अनेक कंप्लायंस को समाप्त कर प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया है। टेक्नॉलॉजी के माध्यम से लाभार्थियों को सीधे सुविधाओं से जोड़ा जा रहा है, जिससे “इज ऑफ लिविंग” को प्राथमिकता मिली है। सरकार और जन-सामान्य के बीच की दूरी कम करने के लिए जनभागीदारी को राष्ट्रीय अभियानों का आधार बनाया गया है।
डिजिटल भुगतान व्यवस्था का उदाहरण देते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि आज विश्व के आधे से अधिक डिजिटल लेनदेन भारत में होते हैं—यह जन-आंदोलन बने डिजिटल सशक्तिकरण का प्रमाण है।
युवाओं, किसानों और जवानों की भूमिका; 2047 के विकसित भारत का संकल्प
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने किसानों, युवाओं और सशस्त्र बलों की सराहना की। उन्होंने कहा कि स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र की सफलता का बड़ा श्रेय युवा उद्यमियों को जाता है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण में युवा शक्ति निर्णायक भूमिका निभाएगी—यह उनका विश्वास है।
संविधान, भाषाएँ और संवैधानिक राष्ट्रीयता
राष्ट्रपति ने रेखांकित किया कि भारत का संविधान अब आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। संविधान को अपनी भाषा में पढ़ना-समझना संवैधानिक राष्ट्रीयता और आत्मगौरव को मजबूत करेगा। उन्होंने 26 जनवरी 1950 से अब तक गणतंत्र की यात्रा को संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्शों से जोड़ा।
‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मतदाताओं की जागरूकता लोकतंत्र की शक्ति है, और मतदान में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इस शक्ति का जीवंत उदाहरण है।
सुरक्षा, पर्यावरण और वैश्विक शांति का संदेश
राष्ट्रपति ने सुरक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का उल्लेख करते हुए आतंकवाद के ठिकानों पर सटीक प्रहार करने की क्षमता को देश की बढ़ती सामर्थ्य से जोड़ा। पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में उन्होंने कहा कि प्रकृति के साथ संतुलित जीवन भारत की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है और इस क्षेत्र में भारत विश्व समुदाय का मार्गदर्शन कर रहा है।
दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी संघर्षों की पृष्ठभूमि में उन्होंने विश्व-शांति की पैरोकारी को भारत की प्रतिबद्धता बताया। साथ ही, गुलामी की मानसिकता के अवशेषों से मुक्त होकर भारतीय ज्ञान परंपरा—दर्शन, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, गणित, साहित्य और कला—की विरासत को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने महात्मा गांधी, सरदार पटेल, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, डॉ. भीमराव आंबेडकर, रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, सुब्रमण्यम भारती, महर्षि अरविंद, नारायण गुरु और बिरसा मुंडा सहित अनेक विभूतियों का संदर्भ दिया।













