नई दिल्ली, 18 मई 2026 (सोमवार)। भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह सोमवार को चार दिवसीय वियतनाम और दक्षिण कोरिया दौरे पर रवाना हुए। 18 से 21 मई तक चलने वाली इस अहम यात्रा का केंद्र हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रक्षा सहयोग बढ़ाना, समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देना है। बदलते वैश्विक समीकरणों और एशिया में बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा के बीच इस दौरे को भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत सरकार की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, इस यात्रा में रक्षा उत्पादन, सैन्य प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास, समुद्री सुरक्षा और रक्षा उद्योगों के बीच साझेदारी जैसे मुद्दों पर विशेष फोकस रहेगा। खास बात यह है कि भारत अब केवल रक्षा खरीद तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि मित्र देशों के साथ संयुक्त उत्पादन और तकनीकी सहयोग को भी आगे बढ़ा रहा है।
हिंद-प्रशांत रणनीति पर रहेगा मुख्य फोकस
रवाना होने से पहले रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि वियतनाम और दक्षिण कोरिया दोनों ही भारत के महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यात्रा का मुख्य उद्देश्य रक्षा औद्योगिक साझेदारी को मजबूत करना और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता तथा नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था को बढ़ावा देना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण चीन सागर में बढ़ते तनाव और चीन की आक्रामक गतिविधियों के बीच भारत क्षेत्रीय देशों के साथ अपने रिश्तों को और मजबूत करने की नीति पर काम कर रहा है। यही कारण है कि समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप नौवहन अधिकार जैसे मुद्दे भी चर्चा का अहम हिस्सा बनेंगे।
वियतनाम के साथ रक्षा संबंधों को मिलेगा नया आयाम
राजनाथ सिंह की हनोई यात्रा कई मायनों में अहम मानी जा रही है। हाल ही में वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को “उन्नत व्यापक रणनीतिक साझेदारी” तक ले जाने का फैसला किया था। अब उसी दिशा में रक्षा और सैन्य सहयोग को आगे बढ़ाने की तैयारी दिखाई दे रही है।
हनोई में रक्षामंत्री की मुलाकात वियतनाम के राष्ट्रीय रक्षा मंत्री जनरल फान वान जियांग से होगी। दोनों नेताओं के बीच रक्षा तकनीक, सैन्य प्रशिक्षण, समुद्री सहयोग और रक्षा उद्योगों में संयुक्त उत्पादन की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा होने की उम्मीद है।
भारत और वियतनाम ने जून 2022 में वर्ष 2030 तक रक्षा साझेदारी को मजबूत करने के लिए संयुक्त दृष्टिकोण दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। ऐसे में यह यात्रा उस रणनीतिक रोडमैप को गति देने वाली मानी जा रही है। दिलचस्प बात यह भी है कि यह दौरा वियतनाम के लोकप्रिय पूर्व राष्ट्रपति हो ची मिन्ह की 136वीं जयंती के समय हो रहा है, जिससे इसका प्रतीकात्मक महत्व भी बढ़ गया है।
दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सक्रियता बना बड़ा मुद्दा
दक्षिण चीन सागर को लेकर चीन और कई एशियाई देशों के बीच लंबे समय से विवाद बना हुआ है। वियतनाम, फिलीपींस और ब्रुनेई जैसे देश चीन के दावों का लगातार विरोध करते रहे हैं। क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी ने छोटे देशों की चिंताओं को और बढ़ाया है।
ऐसे माहौल में भारत का वियतनाम के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे व्यापक हिंद-प्रशांत रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। सामरिक जानकारों के मुताबिक, भारत अब इस क्षेत्र में “संतुलनकारी शक्ति” की भूमिका को अधिक सक्रिय तरीके से निभाना चाहता है।
दक्षिण कोरिया के साथ रक्षा उद्योग पर विशेष जोर
वियतनाम दौरे के बाद राजनाथ सिंह मंगलवार को दक्षिण कोरिया पहुंचेंगे, जहां उनकी मुलाकात दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री आन ग्यू-बैक से होगी। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग की समीक्षा के साथ-साथ नई रक्षा परियोजनाओं और तकनीकी साझेदारी पर भी बातचीत होगी।
भारत और दक्षिण कोरिया पिछले कुछ वर्षों में रक्षा निर्माण, जहाज निर्माण और उन्नत सैन्य तकनीक के क्षेत्र में तेजी से करीब आए हैं। भारत सरकार की “मेक इन इंडिया” नीति और दक्षिण कोरिया की तकनीकी क्षमता को एक-दूसरे का पूरक माना जा रहा है।
रक्षामंत्री इस दौरान “भारत-कोरिया रक्षा व्यापार गोलमेज सम्मेलन” की अध्यक्षता भी करेंगे। माना जा रहा है कि इसमें दोनों देशों की निजी और सरकारी रक्षा कंपनियों के बीच निवेश और संयुक्त उत्पादन को लेकर नई संभावनाओं पर चर्चा होगी।
भारत की एक्ट ईस्ट नीति को मिलेगा बल
विशेषज्ञों के अनुसार, यह यात्रा केवल औपचारिक कूटनीतिक दौरा नहीं है, बल्कि एशिया में भारत की बढ़ती रणनीतिक सक्रियता का संकेत भी है। भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” और दक्षिण कोरिया की “इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी” के बीच बढ़ता तालमेल दोनों देशों को एक मजबूत साझेदारी की ओर ले जा रहा है।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र आज वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और सामरिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुका है। ऐसे में भारत अपने मित्र देशों के साथ रक्षा और समुद्री सहयोग को मजबूत कर क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की दिशा में लगातार कदम बढ़ा रहा है।









