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संवैधानिक मूल्य: CJI सूर्यकांत ने HC से सक्रिय भूमिका का आह्वान, कहा— देरी से मिलता न्याय, न्याय का विनाश

On: January 24, 2026
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CJI सूर्यकांत ने HC से सक्रिय भूमिका का आह्वान
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नई दिल्ली, 24 जनवरी 2026। न्याय व्यवस्था की दिशा और दशा पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने उच्च न्यायालयों से संवैधानिक मूल्य की रक्षा में अधिक सक्रिय और सजग भूमिका निभाने का आह्वान किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उच्च न्यायालय केवल किसी के दरवाजा खटखटाने का इंतजार न करें, बल्कि कानून के शासन (Rule of Law) में जहां भी व्यवस्थागत विफलताएं दिखें, वहां स्वतः संज्ञान लेकर हस्तक्षेप करें।

मुंबई में आयोजित ‘फली नरीमन मेमोरियल लेक्चर’ और बॉम्बे हाईकोर्ट के सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए CJI ने न्याय वितरण प्रणाली की चुनौतियों और सुधार की दिशा पर गंभीर विचार रखे। उनके भाषण का केंद्र बिंदु था— न्याय में देरी, संवैधानिक जिम्मेदारी और उच्च न्यायालयों की वास्तविक भूमिका।

“न्याय में देरी, न्याय का विनाश”

CJI सूर्यकांत ने न्यायिक विलंब पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा,

“न्याय में देरी न केवल न्याय से इन्कार है, बल्कि यह न्याय का विनाश है।”

उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि न्याय तक पहुंच को ‘निष्क्रिय अधिकार’ (Passive Right) के रूप में नहीं, बल्कि ‘राज्य-गारंटीकृत सेवा’ (State-Guaranteed Service) के रूप में देखा जाए। उनका संकेत साफ था— न्याय व्यवस्था को प्रतिक्रियात्मक (reactive) नहीं, बल्कि सक्रिय (proactive) बनना होगा।

हाईकोर्ट: आम नागरिक का ‘प्राथमिक प्रहरी’

CJI ने यह भी स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालयों को केवल सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने का माध्यम समझना एक गलत धारणा है। उन्होंने कहा कि आम नागरिक के लिए उच्च न्यायालय ही न्याय का पहला और सबसे प्रभावी मंच है। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अंतिम हो सकता है, लेकिन हाईकोर्ट का निर्णय अक्सर नागरिक के जीवन पर तत्काल और गहरा प्रभाव डालता है।

उन्होंने संपन्न और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग द्वारा सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचने की प्रवृत्ति की आलोचना करते हुए कहा कि संवैधानिक उपचारों के लिए पहले हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए। इससे न केवल न्यायालयों पर बोझ कम होगा, बल्कि न्याय का विकेंद्रीकरण भी मजबूत होगा।

मध्यस्थता और सुलह: परिपक्व न्याय का साधन

न्यायालयों में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के संदर्भ में CJI ने मध्यस्थता (Mediation) और सुलह (Conciliation) तंत्र को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन्हें केवल ‘सुविधा का विकल्प’ नहीं, बल्कि ‘परिपक्व न्याय का साधन’ माना जाना चाहिए।

उनके अनुसार, मध्यस्थता से समय और धन की बचत होती है, साथ ही विवादित पक्षों के संबंध भी सुरक्षित रहते हैं— जो पारंपरिक मुकदमेबाजी में अक्सर टूट जाते हैं।

तकनीक अपनाने का आग्रह

CJI ने उच्च न्यायालयों से डिजिटल युग के अनुरूप खुद को ढालने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि तकनीक को अपनाकर न्याय को अधिक सुलभ, पारदर्शी और प्रभावी बनाया जा सकता है। ई-कोर्ट्स, वर्चुअल सुनवाई और डिजिटल रिकॉर्ड जैसी व्यवस्थाएं न्याय वितरण प्रणाली को नई गति दे सकती हैं।

संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का आह्वान

अपने संबोधन के अंत में CJI सूर्यकांत ने उच्च न्यायालयों को याद दिलाया कि वे केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि संवैधानिक मूल्य के संरक्षक (Guardian) भी हैं। उन्हें समाज में न्याय, समानता और स्वतंत्रता की भावना को जीवित रखने के लिए पहल करनी होगी।

CJI के इन विचारों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि न्यायपालिका की भूमिका केवल निर्णय देने तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यवस्था में व्याप्त कमियों को पहचानकर उन्हें सुधारने की भी है— और इस दिशा में उच्च न्यायालयों की भूमिका निर्णायक है।

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