नई दिल्ली/4 सितंबर 2026। वैश्विक अर्थव्यवस्था में बदलते समीकरणों के बीच बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर ने भारत और यूरोप के रिश्तों को लेकर अहम टिप्पणी की है। उन्होंने स्वीकार किया कि यूरोप ने आर्थिक और व्यापारिक निर्भरता के जोखिमों को लेकर भारत की पहले दी गई चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया। अब जब निर्भरता को दबाव बनाने के एक साधन के तौर पर इस्तेमाल किए जाने का खतरा सामने आ रहा है, तो यूरोप को इस चुनौती का अहसास हो रहा है।
भारत-यूरोप के बीच रणनीतिक साझेदारी की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए डी वेवर ने कहा कि दोनों पक्षों के सामने कई चुनौतियां समान हैं। मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में अलग-अलग शक्ति समूहों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने देशों को अपनी आर्थिक सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला और रणनीतिक स्वायत्तता पर नए सिरे से विचार करने के लिए मजबूर किया है।
‘PM मोदी ने पहले ही यूरोप को चेतावनी दी थी’
बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने भारत की ओर से दी गई पुरानी चेतावनी का जिक्र करते हुए कहा कि यूरोप ने उस समय इसे नजरअंदाज कर दिया था। उनके मुताबिक, अब यूरोप उस चेतावनी को समझ रहा है।
डी वेवर ने कहा, “आपने यह इतिहास देखा है। आपके प्रधानमंत्री ने पहले ही यूरोप को इस बारे में चेतावनी दी थी, लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। उनकी बात नहीं सुनी गई। अब हम सुन रहे हैं।”
उन्होंने माना कि यूरोप को यह अहसास शायद देर से हुआ है, लेकिन अब वह वास्तविकता को समझने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उनके बयान का संदर्भ उस बढ़ती चिंता से है, जिसमें किसी एक देश या शक्ति समूह पर अत्यधिक आर्थिक निर्भरता को भविष्य में रणनीतिक दबाव के रूप में इस्तेमाल किए जाने की आशंका रहती है।
‘निर्भरता का इस्तेमाल हमारे खिलाफ हथियार के तौर पर न हो’
डी वेवर ने कहा कि भारत और यूरोप के सामने कई मायनों में एक जैसी चुनौतियां हैं। उन्होंने ऐसे शक्ति समूहों का जिक्र किया जो दुनिया को अपनी पसंद की दिशा में ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यूरोप नहीं चाहता कि कोई देश अपनी इच्छा थोपे और आर्थिक निर्भरता को दूसरे देशों के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करे। यही कारण है कि भरोसेमंद साझेदारों के साथ संबंध मजबूत करना अब यूरोप की प्राथमिकताओं में शामिल हो रहा है।
बात केवल कारोबार की नहीं है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में किसी एक स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता का असर संकट के समय उत्पादन, कीमतों और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि भारत और यूरोप के बीच सहयोग को अब व्यापक रणनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है।
भारत के साथ साझेदारी को लेकर बेल्जियम PM ने क्यों दिया जोर?
जब डी वेवर से पूछा गया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के बंटते स्वरूप के बीच भारत और यूरोप मजबूत रणनीतिक साझेदारी कैसे बना सकते हैं और व्यापार, निवेश, तकनीक तथा सप्लाई चेन के क्षेत्र में भारत को दीर्घकालिक साझेदार क्यों माना जाना चाहिए, तो उन्होंने भारत को लेकर बेहद सकारात्मक रुख दिखाया।
उन्होंने कहा कि यूरोप अब ऐसे साझेदारों की सक्रिय तलाश कर रहा है, जो बहुपक्षवाद और सम्मान पर आधारित सहयोग में विश्वास रखते हों। उनका कहना था कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत ऐसा साझेदार है, जिसके साथ यूरोप दीर्घकालिक संबंध विकसित कर सकता है।
डी वेवर ने यहां तक कहा कि यदि संभावित साझेदारों की सूची में भारत का नाम नहीं है तो कोई “बहुत बुनियादी बात” नजरअंदाज की जा रही है। उन्होंने भारत को इस सूची में पहले स्थान पर रखा।
भारत की तेज आर्थिक वृद्धि को बताया बड़ी ताकत
बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने भारत की अर्थव्यवस्था और यहां मौजूद प्रतिभाओं की भी प्रशंसा की। उन्होंने भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बताते हुए कहा कि देश के पास प्रतिभा का बड़ा आधार है और भविष्य में सहयोग की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।
उन्होंने भारत की तुलना जापान जैसी अधिक परिपक्व अर्थव्यवस्थाओं से करते हुए संकेत दिया कि भारत के साथ साझेदारी में विकास की नई संभावनाएं खुल सकती हैं। उनके मुताबिक, भारत और यूरोप के बीच सहयोग दोनों पक्षों के लिए साझा आर्थिक लाभ और विकास के नए अवसर पैदा कर सकता है।
ऐसे समय में जब दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अपनी सप्लाई चेन को अधिक सुरक्षित और विविध बनाने की कोशिश कर रही हैं, डी वेवर का बयान भारत की बढ़ती रणनीतिक और आर्थिक भूमिका की ओर भी इशारा करता है। यूरोप के लिए भारत अब केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि भरोसेमंद और दीर्घकालिक साझेदार के रूप में भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है।












